पंथ सूना था, नयन भीगे रहे,
कौन था जो मेरी सुधि में आ गया।
एक युग बीता प्रतीक्षा में मगर,
नाम उसका अधरों पर रह गया।
सांझ उतरी, दीप थरथराने लगे,
व्योम पर बादल घने छाने लगे।
एक तारा टूटकर ऐसा गिरा,
ज्यों किसी का स्वप्न ही मरने लगा।
प्राण में अब भी वही स्पंदन मगर,
हाथ में कुछ भी नहीं, दामन मगर।
जिसको पाने की अभिलाषा थी कभी,
वह नियति के पार क्यों जाने लगा।
चाँदनी भी आज कुछ उदास है,
निशा के उर में कैसी प्यास है।
चाँद निकला, फिर भी तम कम न हुआ,
कौन मेरा आखिरी उजला दिया ले गया
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- राकेश कुमार तिवारी