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भोंदूमल बेकार थे, हुआ पिलपिला हाल।
फ़ाक़े होने लगे तब, पहुँच गए ससुराल॥
पहुँच गए ससुराल, बीस दिन करो चराई।
पाँच किलो बढ़ गया वज़न, आई चिकनाई॥
घर आए तो देखा, छह मेहमान डट रहे।
उनके दर्शन करते ही, छ...और पढ़ें
कुछ का व्यवहार बदल गया। कुछ का नहीं
बदला।
जिनसे उम्मीद थी, नहीं बदलेगा
उनका बदल गया।
जिनसे आशंका थी,
नहीं बदला।
जिन्हें कोयला मानता था
हीरों की तरह
चमक उठे।
जिन्हें हीरा मानता था
क...और पढ़ें
ज़िंदगी जैसी तवक़्क़ो' थी नहीं कुछ कम है
हर घड़ी होता है एहसास कहीं कुछ कम है
घर की ता'मीर तसव्वुर ही में हो सकती है
अपने नक़्शे के मुताबिक़ ये ज़मीं कुछ कम है
बिछड़े लोगों से मुलाक़ात कभी फ...और पढ़ें
उन को ये शिकायत है कि हम कुछ नहीं कहते
अपनी तो ये आदत है कि हम कुछ नहीं कहते
मजबूर बहुत करता है ये दिल तो ज़बाँ को
कुछ ऐसी ही हालत है कि हम कुछ नहीं कहते
कहने को बहुत कुछ था अगर कहने पे आते
द...और पढ़ें
अब मैं कुछ कहना नहीं चाहता,
सुनना चाहता हूँ
एक समर्थ सच्ची आवाज़
यदि कहीं हो।
अन्यथा
इससे पूर्व कि
मेरा हर कथन
हर मंथन
हर अभिव्यक्ति
शून्य से टकराकर फिर वापस लौट आए,
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'हिंदी हैं हम' शब्द शृंखला में आज का शब्द है- खड्ग, जिसका अर्थ है- एक प्रकार की तलवार, खाँड़ा। प्रस्तुत है विमल राजस्थानी की कविता- धरती को श्वर्ग बना मानव !
धरती को स्वर्ग बना मानव !
तू मुक्ति-मोक्ष की बात न कर
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जब तक प्रश्न है, तभी तक साहित्य है।
- श्रीकांत वर्मा
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फिर वही मैं हूँ वही शहर-बदर सन्नाटा
मुझ को डस ले न कहीं ख़ाक-बसर सन्नाटा
दश्त-ए-हस्ती में शब-ए-ग़म की सहर करने को
हिज्र वालों ने लिया रख़्त-ए-सफ़र सन्नाटा
किस से पूछूँ कि कहाँ है मिरा रोने वाला...और पढ़ें
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अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली...और पढ़ें