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अली सरदार जाफ़री: उन दोनों को फ़ारसी नहीं आती थी लेकिन हाफ़िज का शेर याद था

Ali Sardar Jafri on Hafiz Sher
                
                                                         
                            

मेरे सोवियत यूनियन के सफ़र की ख़ुशगवार यादों के निगारख़ाने में दो नौजवान आर्मेनी इंजीनियर भी हैं। उनके नाम मैंने पूछे थे लेकिन फिर याद नहीं रह गए। लेकिन वो दिल पर जो नक़्श छोड़ गए वो अब भी ताज़ा हैं। मेरे और उनके दरमियां हाफ़िज़ शिराज़ी का एक शेर है जिसने हमारी बाहमी मुहब्बत के रिश्ते को मज़बूत कर दिया है। अक्सर ऐसा होता है कि अच्छी शायरी टूटे हुए दिलों को जोड़ देती हैं, बिछड़े हुए को मिला देती है और अजनबियों को दोस्त बना देती है।

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4 वर्ष पहले

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