आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

निशा पूछती रही

                
                                                         
                            पंथ सूना था, नयन भीगे रहे,
                                                                 
                            
कौन था जो मेरी सुधि में आ गया।
एक युग बीता प्रतीक्षा में मगर,
नाम उसका अधरों पर रह गया।

सांझ उतरी, दीप थरथराने लगे,
व्योम पर बादल घने छाने लगे।
एक तारा टूटकर ऐसा गिरा,
ज्यों किसी का स्वप्न ही मरने लगा।

प्राण में अब भी वही स्पंदन मगर,
हाथ में कुछ भी नहीं, दामन मगर।
जिसको पाने की अभिलाषा थी कभी,
वह नियति के पार क्यों जाने लगा।

चाँदनी भी आज कुछ उदास है,
निशा के उर में कैसी प्यास है।
चाँद निकला, फिर भी तम कम न हुआ,
कौन मेरा आखिरी उजला दिया ले गया
:
- राकेश कुमार तिवारी 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर