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सिलसिला ही तोड़ दिया,आने-जाने का।

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सिलसिला ही तोड़ दिया,आने-जाने का।
        
                                                    
                            
हुनर सीखा है जब से, बहाने बनाने का।।

करीब आते-आते , दूर हो जाते हैं लोग।
कितना अजीब है, ये चलन ज़माने का।।

हद-ए-निगाह तक, जब छाये हों वीराने।
क्या मानी, फिर कोई बज़्म सजाने का।।

प्यास की शिद्दत, और सवा हो जाती है।
बड़ा अनोखा है ये निजाम मयखाने का।।
-यूनुस खान 
3 दिन पहले
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