सिलसिला ही तोड़ दिया,आने-जाने का।
हुनर सीखा है जब से, बहाने बनाने का।।
करीब आते-आते , दूर हो जाते हैं लोग।
कितना अजीब है, ये चलन ज़माने का।।
हद-ए-निगाह तक, जब छाये हों वीराने।
क्या मानी, फिर कोई बज़्म सजाने का।।
प्यास की शिद्दत, और सवा हो जाती है।
बड़ा अनोखा है ये निजाम मयखाने का।।
-यूनुस खान
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