आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

सिलसिला ही तोड़ दिया,आने-जाने का।

                
                                                         
                            सिलसिला ही तोड़ दिया,आने-जाने का।
                                                                 
                            
हुनर सीखा है जब से, बहाने बनाने का।।

करीब आते-आते , दूर हो जाते हैं लोग।
कितना अजीब है, ये चलन ज़माने का।।

हद-ए-निगाह तक, जब छाये हों वीराने।
क्या मानी, फिर कोई बज़्म सजाने का।।

प्यास की शिद्दत, और सवा हो जाती है।
बड़ा अनोखा है ये निजाम मयखाने का।।
-यूनुस खान 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर