ख़ुदा का नूर इतना हो कि हर तमन्ना उसकी पूरी हो,
कभी किसी राज़ में दफ़्न कोई बात ना हो।
हर रज़ा में एक नाम बस तेरा हो,
इक़रार भी न हो, इज़हार भी न हो।
ख़ुदा गवाह हो उस मंज़र का,
जहाँ न कोई तलब बाक़ी हो,
न ही किसी से कोई शिकवा हो।
जहाँ सिर्फ़ मोहब्बत हो चारों तरफ़,
और खैरियत पूछने वाला कोई तो हो।
इत्तेफ़ाक़न कोई गैर न समझ सके मुझे,
मैं तो साज़ में छिपा कोई हर्फ़-सा लगूँ।
बस, जो मेरे हिस्से का है, वो मुझे ही मिले,
यूँ तो कोई फ़ज़ीहत भी न हो, और कोई गिला भी बाक़ी न रहे।