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वो अल्हर बनारस

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तुम बनारस के शाम सी
        
                                                    
                            
मैं सुबह का भटका मुसाफिर सा,
तुम बिस्मिल्ला कि शहनाई सी
मै उस धुन मे खोया कायल सा,
तुम शिव कि ओझल नगरी सी
मै उस नगरी का एक साकिन सा,
तुम गंगा कि स्तुती सी
मै उस भीड़ मे खड़ा उपासक सा,
क्यु लिखूँ मै एक मुसाफिर
तुम अनंत आध्यात्म सी
मै तुझमे समाया शुन्य सा l
4 दिन पहले
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