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कब तक करूं संकेतों की ताबीर

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मैं प्रेम पथिक...
        
                                                    
                            
किंतु स्वीकार्य नहीं मौन निमंत्रण,
है खिली कली या धधक तो,
ज़ुबाँ से दो निशा निमंत्रण।

नयनों में यदि प्यास है
तो अधरों पर भी हो स्वीकार
कब तक करूं संकेतों की ताबीर
कब तक प्रतीक्षा अपार...

मदहोश करती चाँदनी
मगर लब की अमावस
जो भी छिपा है हृदय में
कर दो शब्दों में वर्णन...
- कुमार शशि
51 मिनट पहले
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