मैं प्रेम पथिक...
किंतु स्वीकार्य नहीं मौन निमंत्रण,
है खिली कली या धधक तो,
ज़ुबाँ से दो निशा निमंत्रण।
नयनों में यदि प्यास है
तो अधरों पर भी हो स्वीकार
कब तक करूं संकेतों की ताबीर
कब तक प्रतीक्षा अपार...
मदहोश करती चाँदनी
मगर लब की अमावस
जो भी छिपा है हृदय में
कर दो शब्दों में वर्णन...
- कुमार शशि
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X