विज्ञापन

हथेली पर अब न मच्छर था, न उसका अहंकार

User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वह बैठा था निश्चिंत
        
                                                    
                            
हथेली के उस मखमली पृष्ठ पर,
जिसे उसने अपनी जागीर समझ लिया था।
उसकी सुई जैसी सूंड
खाल को बेधकर गहरे उतर चुकी थी,
वह मदहोश था...
गरम और ताजे रक्त के स्वाद में।
उसे गुमान था कि वह 'सिस्टम' के ऊपर है,
उसे लग रहा था कि यह देह, यह आधार,
सिर्फ उसकी भूख मिटाने के लिए बना है।
वह इतना मशगूल था अपने उपभोग में
कि उसे महसूस ही नहीं हुआ-
कि कब उसके पैरों के नीचे की जमीन (हथेली)
ने अपना रुख बदल लिया।
सत्ता की सुरा पीकर जब आँखें मूंद ली जाती हैं,
तब अक्सर जनादेश की करवट दिखाई नहीं देती।
तभी...
हथेली पलटी, आधार गायब हुआ,
और इससे पहले कि वह अपने पर फड़फड़ाता,
आसमान की ओर से दूसरी हथेली काल बनकर उतरी।
पटाक!
एक शोर हुआ, और खेल खत्म।
हथेली पर अब न मच्छर था, न उसका अहंकार,
वहाँ बस एक खूनी धब्बा था-
जिसमें आधा खून उस मच्छर का था,
और आधा उस जनता का,
जिसे वह अपना समझकर चूस रहा था।
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

श्री सनातन

671 कविताएं

View Profile

Updesh Kumar

13377 कविताएं

View Profile

Dn Chaubey

7459 कविताएं

View Profile