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हथेली पर अब न मच्छर था, न उसका अहंकार

                
                                                         
                            वह बैठा था निश्चिंत
                                                                 
                            
हथेली के उस मखमली पृष्ठ पर,
जिसे उसने अपनी जागीर समझ लिया था।
उसकी सुई जैसी सूंड
खाल को बेधकर गहरे उतर चुकी थी,
वह मदहोश था...
गरम और ताजे रक्त के स्वाद में।
उसे गुमान था कि वह 'सिस्टम' के ऊपर है,
उसे लग रहा था कि यह देह, यह आधार,
सिर्फ उसकी भूख मिटाने के लिए बना है।
वह इतना मशगूल था अपने उपभोग में
कि उसे महसूस ही नहीं हुआ-
कि कब उसके पैरों के नीचे की जमीन (हथेली)
ने अपना रुख बदल लिया।
सत्ता की सुरा पीकर जब आँखें मूंद ली जाती हैं,
तब अक्सर जनादेश की करवट दिखाई नहीं देती।
तभी...
हथेली पलटी, आधार गायब हुआ,
और इससे पहले कि वह अपने पर फड़फड़ाता,
आसमान की ओर से दूसरी हथेली काल बनकर उतरी।
पटाक!
एक शोर हुआ, और खेल खत्म।
हथेली पर अब न मच्छर था, न उसका अहंकार,
वहाँ बस एक खूनी धब्बा था-
जिसमें आधा खून उस मच्छर का था,
और आधा उस जनता का,
जिसे वह अपना समझकर चूस रहा था।
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एक दिन पहले

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