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धूल के कण

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जो दर्द को हँसी में छिपाए हुजूर रहा।
        
                                                    
                            
वही सस्ते नशे के साथ-साथ जी रहा।।

असली मजा नसीब से बाहर रहा होगा।
शुक्रिया किस को करे बे-नाम जी रहा।।

चाहने भर से अगर बग़ावत फैल जाती।
फिर न हम जी रहे होते न वो जी रहा।।

हवा में धूल के कण मिलकर हुए ज़ख्मी।
वो जिसकी साँस में जाते न वो जी रहा।।

सुकून मिलता उसको आजकल 'उपदेश'।
जो चाहतों के रिवाजों के बगैर जी रहा।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
2 महीने पहले
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