मैं कौन हूं
यह प्रश्न बार बार मुझे आखिर क्यों कुरेदता
इसका कोई उत्तर भी है या न मै जानता
क्या हु मै एक मनुष्य या फिर तुक्ष्य सा प्राणी हूं
क्या मै भाग्य विधाता हु या फिर भाग्य विनाशक हूं
आखिर मै हूं कौन क्यों इसी में उलझ रहता हु
क्यों अपने प्रश्नों के उत्तर में सिमटा रहता हु
क्यों अपनों के बीच में अलग थलग सा रहता हु
क्या ये दुनिया मेरी है या मैं ही पूरी दुनिया हु
क्या ये ब्रह्मांड मेरा है या फिर मै ही ब्रह्म हु
क्या मुझमें है अहंकार या फिर घमंड से भरा हुआ
क्या मैं नास्तिक हु या फिर तर्क से भरा हुआ
क्या ईश्वर है यह प्रश्न मुझे क्यों बार बार है कुरेदता
क्या मैं ही ईश्वर हु ये भी हो सकता
कभी पागल सा कभी आवारा कभी मस्त मलंग सा घूमता
कभी शांत सा चिंतन भाव में एकांत ढूंढता
क्यों मनुष्य से मुझे अब नफरत होने लगती है
क्यों पहाड़ों और झरनों में अपनापन सा लगता है
क्यों गुमनामी सी जिंदगी में अपनापन सा लगता है
क्यों अपने प्रश्नों में उलझा मै पतझड़ सा रहता हु
क्यों लगता है मै सत्य खोजने निकला हु
क्यों लगता है मै सत्य असत्य का बंधन हु
क्यों मुझे बंधनों से बंधे रहना स्वीकार नहीं
क्यों मुझे बंधनों से मुक्त रहना स्वीकार नहीं
क्यों कभी किताबें बोझ सी लगती
क्यों कभी किताबें अपनी सी
क्यों कृष्ण नहीं है पसंद मुझे
क्यों कर्ण के पीछे भागता हु
कभी सोचता हु मै कर्ण तो नहीं
कभी लगता है मै कर्ण हु
कही ये काल्पनिक बातें भी मेरे मन को न मोड़ दे
कही ये अब मन का वहम भी मुझे अंधकार में न झोंक दे
मै नास्तिक ही बेहतर हूं मुझे सत्य जानने का अधिकार है
मुझे गड़रिए की भेड़ बनना अस्वीकार है
मै हु कौन ये जानने का भी अधिकार है
घर का निकम्मा नकारा पैसों में आग लगता हु
समाज का दुत्कारा उल्टी धारा में बहता हु
मै बार बार बस यही पूछता हु
मै हु कौन मै हूं कौन बस यही राग अल्पता हु
मै कौन हु मै हु कौन मै कौन हु मै.......????