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मेरा गम

SHAILESH KUMAR AGGARWAL

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ये गम मुझको यार समझता
        
                                                    
                            
या फिर रिश्तेदार समझता!!

आ जाता है जब दिल चाहे
छुट्टी न इतवार समझता!!

पैर पड़ा और हाथ भी जोड़े
विनती न मनुहार समझता!!

अपनी मर्जी का मालिक है
अपनी ही सरकार समझता!!

खुशियोँ की गर बात करूँ तो
खुद पर अत्याचार समझता!!

इक के पीछे इक और आता
अपना ही घरबार समझता!!

दिल पर पत्थर रख लेता हूँ
मजबूरी को प्यार समझता!!
शैलेश अग्रवाल "नीर"
 
3 दिन पहले
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