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मेरा गम

                
                                                         
                            ये गम मुझको यार समझता
                                                                 
                            
या फिर रिश्तेदार समझता!!

आ जाता है जब दिल चाहे
छुट्टी न इतवार समझता!!

पैर पड़ा और हाथ भी जोड़े
विनती न मनुहार समझता!!

अपनी मर्जी का मालिक है
अपनी ही सरकार समझता!!

खुशियोँ की गर बात करूँ तो
खुद पर अत्याचार समझता!!

इक के पीछे इक और आता
अपना ही घरबार समझता!!

दिल पर पत्थर रख लेता हूँ
मजबूरी को प्यार समझता!!
शैलेश अग्रवाल "नीर"
 
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15 घंटे पहले

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