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वक्त की गिरह

SATYANIDHI DWIVEDI

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            वक्त की गिरह
        
                                                    
                            
लेखनी और खुद से संवाद में कभी कभी कुछ ऐसी रचनाओं का मर्म दिल में गहरे तक उतर जाता है
आज कल रिश्ते निभाने और सवांरने में वक्त हाथ से निकल जाता है
कभी जज्बातों की फिकर सताती है
और कभी अपना ही यह चेहरा आयने की जद में धुंधलाया नजर आता है दो घड़ी पास बैठो तो सही
जी भर कर निहार लूं
वरना जो इस जमाने से गया तो कौन इस गिरह में लौट पाता है
-सत्यनिधि द्विवेदी अंशिल
1 सप्ताह पहले
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