वक्त की गिरह
लेखनी और खुद से संवाद में कभी कभी कुछ ऐसी रचनाओं का मर्म दिल में गहरे तक उतर जाता है
आज कल रिश्ते निभाने और सवांरने में वक्त हाथ से निकल जाता है
कभी जज्बातों की फिकर सताती है
और कभी अपना ही यह चेहरा आयने की जद में धुंधलाया नजर आता है दो घड़ी पास बैठो तो सही
जी भर कर निहार लूं
वरना जो इस जमाने से गया तो कौन इस गिरह में लौट पाता है
-सत्यनिधि द्विवेदी अंशिल
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