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मर जाता जब जमीर

Sandeep Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            खोती संवेदना मर जाता जब जमीर
        
                                                    
                            
जूं रेंगता नहीं तब लगे कोई भी तीर
मर्यादा आत्मा का टूट जाता संपर्क
कोई कुछ कहे नहीं पड़ता कोई फर्क
आँखो पर सजे निर्लज्जता का ऐनक
आत्मा मरे पर चेहरे पर रहे रौनक
मरे अनेक बार औरों की नजर में
माने खुद को सबसे चालाक शहर में
-कुँवर संदीप सिंह
एक महीने पहले
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