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उस को भी रोना चाहिए।

सुनील देव

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मर्द है तो क्या हुआ उस को भी रोना चाहिए।।
        
                                                    
                            
घर चाहे कैसा भी हो इसको भी धोना चाहिए।।
मुज़रिमों के भेष में है तो चल रहे बचकर सभी,,
चेहरे रखने का हुनर मुझको भी आना चाहिए।।
ख़्वाब की चादर भी अब तो फट गई हर ओर से,,
या इलाही सुबह तक मुझको भी जाना चाहिए।।
क्या हुआ गर देखता हैं आदमी घर से बाहर,,
बोझ तो सबके लिए हैं सबको ही ढोना चाहिए।।
चाँद के उस पार कुछ हैं ना चाँद के इस पार है,,
जब तलक ये जान है सबको ही जीना चाहिए।।
इन खूबसूरत सूरतों में कुछ नहीं रखा है यार,,
आईने से रूबरू यहाँ सबको ही होना चाहिए।।
काटते रहते हो बस तुम ये भी सोचा है कभी ,,
कम से कम एक पेड़ हमको भी बोना चाहिए।।
-सुनील देव
8 घंटे पहले
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