कभी खेतों की गोदी में रेंगा करते थे,
धान के ढेरों पर बेफिक्र लेटा करते थे।
अब तो चाँद से गुफ़्तगू हुए बरसों बीत गए,
कभी खेत की मेड़ पर बैठ, बतियाया करते थे।
तब उजाले की चाबी बस चाँद के पास थी,
मन की वो मासूम कौतूहल तब शांत होती थी।
अब तो बस परिवार की नैया पार लगानी है,
पैसे की क्या अहमियत है, किताबों ने न सिखाई थी।
तो फिर आज क्यों इंसान इतना लाचार है?
हर शब्द मौन है... और बस पैसे की पुकार है।
हाँ, अब इस जहाँ में... सिर्फ पैसे की ही हुंकार है।