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उजाले की चाबी

Ravi Kumar Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी खेतों की गोदी में रेंगा करते थे,
        
                                                    
                            
धान के ढेरों पर बेफिक्र लेटा करते थे।
अब तो चाँद से गुफ़्तगू हुए बरसों बीत गए,
कभी खेत की मेड़ पर बैठ, बतियाया करते थे।

तब उजाले की चाबी बस चाँद के पास थी,
मन की वो मासूम कौतूहल तब शांत होती थी।
अब तो बस परिवार की नैया पार लगानी है,
पैसे की क्या अहमियत है, किताबों ने न सिखाई थी।

तो फिर आज क्यों इंसान इतना लाचार है?
हर शब्द मौन है... और बस पैसे की पुकार है।
हाँ, अब इस जहाँ में... सिर्फ पैसे की ही हुंकार है।
3 महीने पहले
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