आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

उजाले की चाबी

                
                                                         
                            कभी खेतों की गोदी में रेंगा करते थे,
                                                                 
                            
धान के ढेरों पर बेफिक्र लेटा करते थे।
अब तो चाँद से गुफ़्तगू हुए बरसों बीत गए,
कभी खेत की मेड़ पर बैठ, बतियाया करते थे।

तब उजाले की चाबी बस चाँद के पास थी,
मन की वो मासूम कौतूहल तब शांत होती थी।
अब तो बस परिवार की नैया पार लगानी है,
पैसे की क्या अहमियत है, किताबों ने न सिखाई थी।

तो फिर आज क्यों इंसान इतना लाचार है?
हर शब्द मौन है... और बस पैसे की पुकार है।
हाँ, अब इस जहाँ में... सिर्फ पैसे की ही हुंकार है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर