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फिर क्या रखा था यूँ तारीफ़ करने में, पछताने में।

RATAN KUMAR

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जो ज़िंदगी में कभी मेरी तरफ़ देखा नहीं करते,
        
                                                    
                            
वही अब ढूँढते हैं मुझको हर एक उजाले में।

मैं उनके सामने था तो कोई बात न समझी,
अब मेरा ज़िक्र होता है हर एक हवाले में।

मेरी ख़ामोशियों को कमजोरी समझते थे जो,
उन्हें अब शोर सुनाई देता है मेरे ख़ाली प्याले में।

अजीब रस्म है दुनिया की… जीते जी कोई नहीं पूछता,
मगर अफ़सोस बहुत होता है किसी के चले जाने में।

काश तुमने ये ख़ूबियाँ मेरे रहते पहचान ली होतीं,
फिर क्या रखा था यूँ तारीफ़ करने में, पछताने में।

'रतन' अब लौटकर आएगा नहीं वो शख़्स कभी,
जिसे तुम खोज रहे हो अपनी यादों के उजाले में।
-रतन कुमार कैथवास
2 सप्ताह पहले
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