आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

फिर क्या रखा था यूँ तारीफ़ करने में, पछताने में।

                
                                                         
                            जो ज़िंदगी में कभी मेरी तरफ़ देखा नहीं करते,
                                                                 
                            
वही अब ढूँढते हैं मुझको हर एक उजाले में।

मैं उनके सामने था तो कोई बात न समझी,
अब मेरा ज़िक्र होता है हर एक हवाले में।

मेरी ख़ामोशियों को कमजोरी समझते थे जो,
उन्हें अब शोर सुनाई देता है मेरे ख़ाली प्याले में।

अजीब रस्म है दुनिया की… जीते जी कोई नहीं पूछता,
मगर अफ़सोस बहुत होता है किसी के चले जाने में।

काश तुमने ये ख़ूबियाँ मेरे रहते पहचान ली होतीं,
फिर क्या रखा था यूँ तारीफ़ करने में, पछताने में।

'रतन' अब लौटकर आएगा नहीं वो शख़्स कभी,
जिसे तुम खोज रहे हो अपनी यादों के उजाले में।
-रतन कुमार कैथवास
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
6 दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर