विज्ञापन

मौन का उत्सव

Rajeev kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            निचोड़ा जा रहा है शहद छत्ते से बराबर यहाँ,
        
                                                    
                            
मगर मक्खियों को सुरक्षित कोना मिला कहाँ?
खड़े हैं सफ़ेद कफ़न ओढ़े वो आलीशान मकां,
जहाँ साँसों का सौदा होता है और मरता है इंसां।
काँच के पुलों पर राही अब सहमे-सहमे चलते हैं,
पुरानी टीस पर रोज़ नए विज्ञापन भी पलटे हैं।
ओढ़ कर झूठी हँसी, जो पथराई आँखों से रात काटता है,
वही शतरँज का खिलाड़ी है उसी को सही मानता है।कानों में पिघला कर सीसा, जिन्होंने ओढ़ रखी है चादर,
ज़ुबान को पिंजरे में बंद कर, जो बैठे हैं एकदम मौन रहकर।
दीमकों के इस खोखले शहर में आज महफ़ूज़ सिर्फ़ वही सर है,
जिसके भीतर न कोई सवाल है, न सच कहने का कोई डर है।
सबसे ख़तरनाक घड़ी वो नहीं, जब कोई अंगारा सुलग उठे,
सबसे ख़तरनाक तो वो बर्फ़ है, जो हर ज़हन में जम बैठे।
जब मान ले हर कश्ती, कि तूफ़ान से लड़ना अब फ़िज़ूल है,
और आवाज़ उठाना इस दौर में, उनकी सबसे बड़ी भूल है।
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all