आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मौन का उत्सव

                
                                                         
                            निचोड़ा जा रहा है शहद छत्ते से बराबर यहाँ,
                                                                 
                            
मगर मक्खियों को सुरक्षित कोना मिला कहाँ?
खड़े हैं सफ़ेद कफ़न ओढ़े वो आलीशान मकां,
जहाँ साँसों का सौदा होता है और मरता है इंसां।
काँच के पुलों पर राही अब सहमे-सहमे चलते हैं,
पुरानी टीस पर रोज़ नए विज्ञापन भी पलटे हैं।
ओढ़ कर झूठी हँसी, जो पथराई आँखों से रात काटता है,
वही शतरँज का खिलाड़ी है उसी को सही मानता है।कानों में पिघला कर सीसा, जिन्होंने ओढ़ रखी है चादर,
ज़ुबान को पिंजरे में बंद कर, जो बैठे हैं एकदम मौन रहकर।
दीमकों के इस खोखले शहर में आज महफ़ूज़ सिर्फ़ वही सर है,
जिसके भीतर न कोई सवाल है, न सच कहने का कोई डर है।
सबसे ख़तरनाक घड़ी वो नहीं, जब कोई अंगारा सुलग उठे,
सबसे ख़तरनाक तो वो बर्फ़ है, जो हर ज़हन में जम बैठे।
जब मान ले हर कश्ती, कि तूफ़ान से लड़ना अब फ़िज़ूल है,
और आवाज़ उठाना इस दौर में, उनकी सबसे बड़ी भूल है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर