पति-परमेश्वर
वो अपना बचपन,भाई बहन,
घर-आंगन छोड़ आयी,
पिता का प्यार,
माँ का आंचल छोड़ आयी,
नये सिरे से घर बसाया
फिर भी पति ही परमेश्वर कहलाये!
अपने करियर को नए रिश्तो मे उलझा दिया,
बच्चो का बचपन संवारने और ममत्व मे खुद को समर्पित कर दिया, फिर भी पति परमेश्वर कहलाये!
किये सारे व्रत,उपवास,रित-प्रीत, पूजापाठ, तुम मुक्त रहो विपदा से,
फिर भी पति परमेश्वर कहलाये!
तुम्हारा सिन्दूर लगाया इसलिए धर्म से अपनी आजीविका को तुम्हारी ज़रूरत मे लगा दिया और रही मैं परायी की परायी,
फिर भी तुम ही परमेश्वर कहलाये!
सत्यवान के प्राण बचाने सत्यवती यमराज से अड़ गयी फिर भी किसी पुरुष ने अपनी पत्नी के लिए कभी कोई व्रत उपवास नहीं किया!
प्रभु राम का मान बचाने के लिए देवी सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी,रावण की लंका मे भी मर्यादित रही फिर भी मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहलाये!
हम तो स्वयम अन्नपूर्णा, शिवा-गौरी, राधा, मीरा, सत्तीसावित्री ,जगत जननी है!
इसलिये ईश्वर को इसलिये ईश्वर को ईश्वर रहने दो, तुम सिर्फ इंसान बने रहो !
पति-पत्नी का रिश्ता बराबरी, सम्मान और साझेदारी का है, न कि भगवान और भक्त का परमेश्वर का स्थान हृदय में है, और पति का स्थान जीवन में कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले साथी का है।"