आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पति परमेश्वर

                
                                                         
                            पति-परमेश्वर
                                                                 
                            

वो अपना बचपन,भाई बहन,
घर-आंगन छोड़ आयी,
पिता का प्यार,
माँ का आंचल छोड़ आयी,
नये सिरे से घर बसाया
फिर भी पति ही परमेश्वर कहलाये!

अपने करियर को नए रिश्तो मे उलझा दिया,
बच्चो का बचपन संवारने और ममत्व मे खुद को समर्पित कर दिया, फिर भी पति परमेश्वर कहलाये!

किये सारे व्रत,उपवास,रित-प्रीत, पूजापाठ, तुम मुक्त रहो विपदा से,
फिर भी पति परमेश्वर कहलाये!

तुम्हारा सिन्दूर लगाया इसलिए धर्म से अपनी आजीविका को तुम्हारी ज़रूरत मे लगा दिया और रही मैं परायी की परायी,
फिर भी तुम ही परमेश्वर कहलाये!

सत्यवान के प्राण बचाने सत्यवती यमराज से अड़ गयी फिर भी किसी पुरुष ने अपनी पत्नी के लिए कभी कोई व्रत उपवास नहीं किया!
प्रभु राम का मान बचाने के लिए देवी सीता को अग्नि परीक्षा देनी पड़ी,रावण की लंका मे भी मर्यादित रही फिर भी मर्यादा पुरुषोत्तम राम कहलाये!

हम तो स्वयम अन्नपूर्णा, शिवा-गौरी, राधा, मीरा, सत्तीसावित्री ,जगत जननी है!
इसलिये ईश्वर को इसलिये ईश्वर को ईश्वर रहने दो, तुम सिर्फ इंसान बने रहो !

पति-पत्नी का रिश्ता बराबरी, सम्मान और साझेदारी का है, न कि भगवान और भक्त का परमेश्वर का स्थान हृदय में है, और पति का स्थान जीवन में कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाले साथी का है।"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
4 दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर