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मिजाज़ ए बेरुखी

Prem Narayan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            खाकर ठोकरें भटकती तमन्नाओं से धोखा भी कितना हम खाए मुझको बदनाम करने वाले मिजाज़ तेरा समझ ना पाए हैं
        
                                                    
                            
दिल को सकूं कहां ये सोच कर चिराग़ दिल का हम बुझाए मुझे नादां समझने वाले अंदाज ए उल्फत हम समझ ना पाए हैं
करके उम्मीद दिल की बिगड़ी आदतों से किया नुकसान बहुत होना था जब हादसा तो भी मिजाज़ तेरा समझ ना पाए हैं
लिखा रोना जब हम बदनसीबों की किस्मत में तो मैं क्या करूं किया याद तुम्हें बार बार फिर भी इरादा समझ ना पाए हैं
मिले तुम आज़ अचानक जरूर कुछ बात है जीना मेरा आसान कहां राह ए वफा अंदाज़ बेरुखी भी हम समझ ना पाए हैं
एक महीने पहले
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