खाकर ठोकरें भटकती तमन्नाओं से धोखा भी कितना हम खाए मुझको बदनाम करने वाले मिजाज़ तेरा समझ ना पाए हैं
दिल को सकूं कहां ये सोच कर चिराग़ दिल का हम बुझाए मुझे नादां समझने वाले अंदाज ए उल्फत हम समझ ना पाए हैं
करके उम्मीद दिल की बिगड़ी आदतों से किया नुकसान बहुत होना था जब हादसा तो भी मिजाज़ तेरा समझ ना पाए हैं
लिखा रोना जब हम बदनसीबों की किस्मत में तो मैं क्या करूं किया याद तुम्हें बार बार फिर भी इरादा समझ ना पाए हैं
मिले तुम आज़ अचानक जरूर कुछ बात है जीना मेरा आसान कहां राह ए वफा अंदाज़ बेरुखी भी हम समझ ना पाए हैं
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