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मिल जाती अगर मंजिल कहने भर से तो

Poonam milap bansal

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मिल जाती अगर मंजिल कहने भर से तो
        
                                                    
                            
रास्तों की जरूरत ही क्या थी,

मिलती अगर समुंदर भरकर ख़ुशी झोली में तो
आँखो में इन आंसुओं की जरूरत ही क्या थी…

मिलती हँसी अगर चाहने भर से तो, फिर ग़म की सूरत ही क्या थी…

जो मिल जाता आसमाँ बाहों को खोलकर बेख़ौफ़,
तो फिर इस जमीं की ज़रूरत ही क्या थी…

उड़ जाता इंसान भी पंछियों सा अगर आसमाँ में तो
घर में दायरों की ज़रूरत ही क्या थी…
3 महीने पहले
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