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मिल जाती अगर मंजिल कहने भर से तो

                
                                                         
                            मिल जाती अगर मंजिल कहने भर से तो
                                                                 
                            
रास्तों की जरूरत ही क्या थी,

मिलती अगर समुंदर भरकर ख़ुशी झोली में तो
आँखो में इन आंसुओं की जरूरत ही क्या थी…

मिलती हँसी अगर चाहने भर से तो, फिर ग़म की सूरत ही क्या थी…

जो मिल जाता आसमाँ बाहों को खोलकर बेख़ौफ़,
तो फिर इस जमीं की ज़रूरत ही क्या थी…

उड़ जाता इंसान भी पंछियों सा अगर आसमाँ में तो
घर में दायरों की ज़रूरत ही क्या थी…
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3 महीने पहले

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