मैं एक शांत सी नदिया हूँ ये तो नहीं कह सकती
पर ज़्यादा देर शांत तो,मैं नही रह सकती,
तू समुंदर सा गहरा है ऐसा तो नहीं है
कोई तो बात है ऐसी जो तेरे अंदर थमी है…
पिघल जाए जो मोम सी,ऐसी इसमें तपिश तो नहीं है
पर बरफ़ में हो ठहराव, ये भी मुमकिन तो नहीं है…
रेत सी फिसल जाए हाथों से एक दिन , ये जो जिंदगी बनी है
चट्टानों में भी होता है बिखराव ये कुछ भिन्न तो नहीं है…
शीशे का महल हो तो दीवारें रेत की ना होंगी,
ठहर जाए आकर साहिल पे,वो हरगिज़,मौजें तो न होंगी…
मैं, मैं ना रही किसी काम की, बस मुझमें तेरी ही कमी है,
प्रेम वो प्रेम नहीं जिसमें, कोई जिद्द ही नहीं है…
कोई जिद्द,ही नहीं है…
—पूनम बंसल