आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मैं एक शांत सी नदिया हूँ

                
                                                         
                            मैं एक शांत सी नदिया हूँ ये तो नहीं कह सकती
                                                                 
                            
पर ज़्यादा देर शांत तो,मैं नही रह सकती,
तू समुंदर सा गहरा है ऐसा तो नहीं है
कोई तो बात है ऐसी जो तेरे अंदर थमी है…

पिघल जाए जो मोम सी,ऐसी इसमें तपिश तो नहीं है
पर बरफ़ में हो ठहराव, ये भी मुमकिन तो नहीं है…

रेत सी फिसल जाए हाथों से एक दिन , ये जो जिंदगी बनी है
चट्टानों में भी होता है बिखराव ये कुछ भिन्न तो नहीं है…
शीशे का महल हो तो दीवारें रेत की ना होंगी,
ठहर जाए आकर साहिल पे,वो हरगिज़,मौजें तो न होंगी…
मैं, मैं ना रही किसी काम की, बस मुझमें तेरी ही कमी है,
प्रेम वो प्रेम नहीं जिसमें, कोई जिद्द ही नहीं है…
कोई जिद्द,ही नहीं है…

—पूनम बंसल 
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
2 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर