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"अंतरपाठ"

Pankaj Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक दिन
        
                                                    
                            
जब लौटोगे
भीड़ की समस्त आवाज़ों से दूर
अपने भीतर की उस पगडंडी पर,
जहाँ स्मृतियाँ
धूल नहीं,
श्वास बनकर बसती हैं—
तब पहली बार
तुम स्वयं से मिलोगे।

अब तक
तुमने दूसरों की आँखों में
अपना आकार खोजा है।
कभी प्रशंसा में,
कभी अस्वीकृति में,
कभी टूटे संबंधों के दर्पण में।
पर जो मनुष्य
अपनी निस्तब्धता नहीं पढ़ता,
वह संसार का कोई अर्थ
समझ नहीं पाता।

भीतर एक अंधकार है—
पर वही
सबसे प्राचीन प्रकाश भी।
वहीं दबे हैं
वे प्रश्न
जिनसे तुम सदा बचते रहे।
इच्छाएँ, भय,
और सारे कृत्रिम उजाले
उस मौन के सामने
धीरे-धीरे उतर जाते हैं।

स्वयं को पढ़ना
किसी पुस्तक का अध्ययन नहीं,
एक कठोर विघटन है।
जहाँ मनुष्य
अपने ही मिथकों से उतरकर
एक साधारण, अकेले
सत्य के सम्मुख खड़ा होता है।
और तभी
दुनिया अचानक
अपरिचित नहीं लगती।

तब ज्ञात होता है—
बाहरी संसार
भीतर का ही विस्तार है।
जो द्वेष दिखा,
वह किसी भय की छाया था;
जो प्रेम मिला,
वह मौन करुणा का प्रतिरूप।
और जिस दिन
मनुष्य स्वयं को पढ़ लेता है,
उस दिन
संसार भी
उसे पढ़ने लगता है।
एक दिन पहले
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