आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

"अंतरपाठ"

                
                                                         
                            एक दिन
                                                                 
                            
जब लौटोगे
भीड़ की समस्त आवाज़ों से दूर
अपने भीतर की उस पगडंडी पर,
जहाँ स्मृतियाँ
धूल नहीं,
श्वास बनकर बसती हैं—
तब पहली बार
तुम स्वयं से मिलोगे।

अब तक
तुमने दूसरों की आँखों में
अपना आकार खोजा है।
कभी प्रशंसा में,
कभी अस्वीकृति में,
कभी टूटे संबंधों के दर्पण में।
पर जो मनुष्य
अपनी निस्तब्धता नहीं पढ़ता,
वह संसार का कोई अर्थ
समझ नहीं पाता।

भीतर एक अंधकार है—
पर वही
सबसे प्राचीन प्रकाश भी।
वहीं दबे हैं
वे प्रश्न
जिनसे तुम सदा बचते रहे।
इच्छाएँ, भय,
और सारे कृत्रिम उजाले
उस मौन के सामने
धीरे-धीरे उतर जाते हैं।

स्वयं को पढ़ना
किसी पुस्तक का अध्ययन नहीं,
एक कठोर विघटन है।
जहाँ मनुष्य
अपने ही मिथकों से उतरकर
एक साधारण, अकेले
सत्य के सम्मुख खड़ा होता है।
और तभी
दुनिया अचानक
अपरिचित नहीं लगती।

तब ज्ञात होता है—
बाहरी संसार
भीतर का ही विस्तार है।
जो द्वेष दिखा,
वह किसी भय की छाया था;
जो प्रेम मिला,
वह मौन करुणा का प्रतिरूप।
और जिस दिन
मनुष्य स्वयं को पढ़ लेता है,
उस दिन
संसार भी
उसे पढ़ने लगता है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
57 minutes ago

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर