गीत
छीन ले जब जग सहारा तुम मुझे भुजपाश देना।
कल्पना की नव उड़ानों को नया आकाश देना।।
मन जलाती ही रही है वेदना की मौन-कारा।
अश्रुनादों पर हमारे नृत्यरत संसार सारा।।
आस-तरु को खोखलाकर ये नियति होली जलाये।
काल का घोषित प्रभंजन स्वप्न के सब घर ढहाये।।
इस जगत की वीथियों में व्याल मद के डस रहे हैं।
भव्यता से युक्त मुझको तुम शिखर कैलाश देना।
कल्पना की नव उड़ानों को नया आकाश देना।।
सिंधु सा विस्तार तुम हो उर्मि सी चंचल हूॅं मैं।
तुम शयन की शांत मुद्रा सृष्टि की हलचल हूॅं मैं।।
तुम खुशी का केंद्र प्रियवर प्राण- पण अर्पण तुम्हें।
नित्य ही खुद को सॅंवारा मानकर दर्पण तुम्हें।।
उस क्षितिज की देहरी तक हाथ को थामे चलो प्रिय।
प्रेम-पथ की सेविका को अब नहीं अवकाश देना।
कल्पना की नव उड़ानों को नया आकाश देना।।
सत्य के तुम सारथी बन साथ में चलते रहो प्रिय।
जब मनोबल टूटता हो हाथ सिर रखते रहो प्रिय।
जब कभी ये मन भ्रमित हो पंथ तुम मुझको दिखाना।
बस प्रलय की क्रूर नज़रों से सदा मुझको बचाना।।
बूॅंद सी ज्यों मेघ-उर में हो रमण विश्वास का फिर।
प्रीति की अनुभूतियों के पल मुझे अविनाश देना।
कल्पना की नव उड़ानों को नया आकाश देना।।
-नीलम सिंह