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एक गलती की सजा

Kashish

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            एक गलती की सज़ा
        
                                                    
                            

क्यों एक गलती
पूरी ज़िंदगी की सज़ा बन जाती है,
आख़िर वो कहावत
आँखों के सामने सच हो ही जाती है।

वो धागा जब टूट जाता है,
तो फिर जुड़ नहीं पाता,
जुड़ भी जाता है
तो पहले जैसा नहीं रहे पाता है

एक गलती
पूरी ज़िंदगी की सज़ा बन ही जाती है,
अपनों के बीच
दूरियों की माला पिरो ही जाती है।

हाँ, हाथों के बीच
एक खालीपन की लकीर
बना ही जाती है।

वो मोती का धागा
आख़िर जब टूट ही जाता है,
वो विश्वास की कड़ी
फिर कभी जुड़ नहीं पाती है।

आख़िर दुख की माला
हाथों की लकीरों में
अपना बसेरा बना ही जाती है।

ख़्वाहिशों को समेटे,
वो थर-थर काँपती
वो टूटे हुए ख़्वाब
फिर कभी पिरो नहीं पाती।

काश…
एक गलती
उसकी ज़िंदगी की सज़ा
न बन पाती।
एक महीने पहले
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Manju Sharma

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