एक गलती की सज़ा
क्यों एक गलती
पूरी ज़िंदगी की सज़ा बन जाती है,
आख़िर वो कहावत
आँखों के सामने सच हो ही जाती है।
वो धागा जब टूट जाता है,
तो फिर जुड़ नहीं पाता,
जुड़ भी जाता है
तो पहले जैसा नहीं रहे पाता है
एक गलती
पूरी ज़िंदगी की सज़ा बन ही जाती है,
अपनों के बीच
दूरियों की माला पिरो ही जाती है।
हाँ, हाथों के बीच
एक खालीपन की लकीर
बना ही जाती है।
वो मोती का धागा
आख़िर जब टूट ही जाता है,
वो विश्वास की कड़ी
फिर कभी जुड़ नहीं पाती है।
आख़िर दुख की माला
हाथों की लकीरों में
अपना बसेरा बना ही जाती है।
ख़्वाहिशों को समेटे,
वो थर-थर काँपती
वो टूटे हुए ख़्वाब
फिर कभी पिरो नहीं पाती।
काश…
एक गलती
उसकी ज़िंदगी की सज़ा
न बन पाती।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X