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आनन ढाँकि रही

Indra Prasad

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आनन फानन में सजनी अँचरा तर आनन ढाँकि रही है।
        
                                                    
                            
पै जिय मानत है जिय की नहिं नैनन ते मग ताकि रही है।
पाँवन पंजन ते भुँइ खोदत सोचत ही तन काँपि रही है।
नैनन में अति आतुरता भरि ना पलकै वह झाँपि रही है।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
एक महीने पहले
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