आनन फानन में सजनी अँचरा तर आनन ढाँकि रही है।
पै जिय मानत है जिय की नहिं नैनन ते मग ताकि रही है।
पाँवन पंजन ते भुँइ खोदत सोचत ही तन काँपि रही है।
नैनन में अति आतुरता भरि ना पलकै वह झाँपि रही है।
-इन्द्र प्रसाद 'रत्नेश'
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X