न जाने क्यों.....
न जाने क्यों यह ज़िंदगी,
रेत की तरह हाथों से फिसल रही है,
जिसे अपना समझकर थामा था,
वही मुट्ठी से निकल रही है।
हमने तो बस इतना चाहा था—
दो पल किसी के अपने हो जाएँ,
थके हुए इस सफ़र में कभी,
किसी के कंधे पर सिर रख पाएँ।
मगर यहाँ तो रिश्ते भी,
ज़रूरतों के मौसम में पलते हैं,
सूरज ढलते ही अक्सर,
अपने साये भी साथ छोड़ चलते हैं।
न जाने क्यों जिन्हें दिल दिया,
वही दिल का हिसाब माँगते रहे,
हम ख़ामोश होकर टूटते रहे,
और लोग हमें ख़ुश समझते रहे।
चेहरे पर मुस्कान रखकर,
हमने उम्र गुज़ार दी,
लोगों ने पूछा—“सब ठीक है?”
और हमने हँसकर बात टाल दी।
कितनी अजीब है ये ज़िंदगी—
जिसे पाने में उम्र बीत जाती है,
उसे खोने में एक पल लगता है,
और फिर वही एक पल
पूरी उम्र याद आता है।
कुछ सपने आँखों में रह गए,
कुछ अपने रास्तों में खो गए,
कुछ रिश्ते पास होकर भी दूर थे,
और कुछ दूर होकर भी अपने हो गए।
हम वक़्त को रोकना चाहते थे,
वक़्त हमें ही रोकता रहा,
हम कल की तलाश में चलते रहे,
और आज हमारे हाथों से निकलता रहा।
अब शिकायत किससे करें,
जब कहानी अपनी ही लिखी थी,
जिसे मुकद्दर समझकर जीते रहे,
शायद वो हमारी अपनी ही ख़ामोशी थी।
न जाने क्यों यह ज़िंदगी,
हर रोज़ कुछ कम-सी लगती है,
भीड़ बहुत है चारों तरफ़,
फिर भी तन्हाई साथ चलती है।
लेकिन शायद यही सच है—
ज़िंदगी ठहरने का नाम नहीं,
जो चला गया, वह लौटेगा नहीं,
जो आज है, वह कल होगा नहीं।
इसलिए अब जो पल मिला है,
उसे जी लेने का मन करता है,
टूटे हुए आईने में भी,
अपना चेहरा देखने का मन करता है।
क्योंकि रेत तो फिसलेगी ही,
यह उसकी फ़ितरत है शायद,
पर जब तक मुट्ठी में है कुछ रेत,
तब तक सफ़र बाकी है शायद।
न जाने क्यों यह ज़िंदगी
रेत की तरह हाथों से फिसल रही है…
फिर भी दिल कहता है—
जी ले इसे,
क्योंकि लौटकर आने वाली
सिर्फ़ यादें होती हैं,
ज़िंदगी नहीं।