विज्ञापन

वजन आदमी का

dinesh chauhan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            लकीर दूसरे की मिटा छोटी बनाने में रहता है
        
                                                    
                            
ऊपर चढ़ने को कँधों की तलाश में रहता है.

हरेक हल्की बात को ऊँची आवाज में कहता है
वजन आदमी का पर सूखे पत्ते सा ही रहता है.

दरख्त सूखा सा वो हर बार ज़मीं पर ही गिरता
उड़ने को सारे आकाश की तमन्ना लिए रहता है.

रास्ते मनमानी अपने हिसाब से जब भी चलता
खौफ जमाने से उसे बिलकुल ही नहीं रहता है.

आदमी खुद को जानवरों से बेहतर माना करते
इंसानियत का भाव पर दिल में नहीं रहता है.
-दिनेश चौहान
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile