लकीर दूसरे की मिटा छोटी बनाने में रहता है
ऊपर चढ़ने को कँधों की तलाश में रहता है.
हरेक हल्की बात को ऊँची आवाज में कहता है
वजन आदमी का पर सूखे पत्ते सा ही रहता है.
दरख्त सूखा सा वो हर बार ज़मीं पर ही गिरता
उड़ने को सारे आकाश की तमन्ना लिए रहता है.
रास्ते मनमानी अपने हिसाब से जब भी चलता
खौफ जमाने से उसे बिलकुल ही नहीं रहता है.
आदमी खुद को जानवरों से बेहतर माना करते
इंसानियत का भाव पर दिल में नहीं रहता है.
-दिनेश चौहान
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