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प्रकृति के आगे सब बेबस हैं

Dhirendra Singh

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मंजर भयानक दिख रहा,
        
                                                    
                            
दौड़ रहे सब लोग।
दौड़ लगा रहे सरपट,
भाग गए सब रोग ।।
हृदय झकझोर रही,
ग्लेशियर की चट्टान।
हो जाएगी अनहोनी,
नहीं किसी को भान।।
जलजला जल लेके चला,
जल की है खुद नीति।
प्यासे की प्यास बुझाए,
सुनी जल की ऐसी प्रीति।।
कैलाश मानसरोवर यात्रा,
डालेगी व्यवधान।
धरे के धरे रह गए,
थे जितने अरमान।।
प्रकृति के आगे सब बेबस हैं,
कर देती गुमनाम।
कौन,क्या,किस हाल में होगा,
लिख देना प्रभु राम।।
हौसला बँधे उन सबका भाई,
जिसका गया है लाल।
शरणागत थे जो भी,
ईश्वर उन्हें संभाल।।
किसी को शापित ना कर ,
सब को दे वरदान।
हे प्रभु "धुरंधर"प्रार्थना,
कुछ भी करो बख्श दो प्राण।।
-धीरेन्द्र सिंह"धुरंधर
एक महीने पहले
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