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तारीकी-ए-सितम

dev sachdeva

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हर चेहरे पर ये जाने कैसा रंग भर गया,
        
                                                    
                            
लगता है हरेक आँख का सपना बिखर गया।

हर सिम्त उदासी है, सभी हैं यहां तन्हा,
वो जोश-ए-ज़िन्दगी न जाने किधर गया।

इन्सान पर इन्सान का है ज़ब्र हर तरफ,
लगता है इस बस्ती का हर इन्सान मर गया।

इन पत्थरों को जानता हूं ये न पिछलेंगे,
इनकी इबादत हो सके अब वो असर गया।

अब्र-ए-गुरेजां की तरह अब इनक़लाब भी,
बरसा नहीं; इस राह से होकर गुज़र गया।

अनवार-ए-मेहर-ओ-माह में असर नहीं "शमीम",
ये देहर अब तारीकी-ए-सितम से भर गया।
- देवेन्द्र सचदेवा "शमीम"
16 घंटे पहले
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