लहरों की अठखेलियां, मछली कर किलोल।
कानों में है त्र्यंबकं, पवन गया है घोल।।
छम-छम-छम-छम नाचती, आंगन में है बूंद।
जैसे आंगन हो मगन, आंख रहे हैं मूंद।
निखर गया है इन दिनों, झरने का है रूप।
पनघट से बतला रहा, आज गांव का कूप।।
-अविनाश ब्यौहार