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दोहा त्रयी

                
                                                         
                            लहरों की अठखेलियां, मछली कर किलोल।
                                                                 
                            
कानों में है त्र्यंबकं, पवन गया है घोल।।

छम-छम-छम-छम नाचती, आंगन में है बूंद।
जैसे आंगन हो मगन, आंख रहे हैं मूंद।

निखर गया है इन दिनों, झरने का है रूप।
पनघट से बतला रहा, आज गांव का कूप।।
-अविनाश ब्यौहार
 
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2 महीने पहले

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