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मुसाफिर हूं चलते रहना ही नियति मेरी

Arun Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मुसाफिर हूं चलते रहना ही नियति मेरी
        
                                                    
                            
इक दिन तेरी यादों से भी चला जाऊंगा
पर जाने से पहले डूबते हुए सूरज की तरह
मन क्षितिज पे अपनी चमक छोड़ जाऊंगा

जीवन पथ जब कभी धुंधला दिखाई देने लगे
किसी चौरस्ते पे किधर जाऊं मन दुविधा में लगे
प्रिय तब अपनी आंखें मूंद कर हृदय में झांकना
अंतर्मन की रोशनी में मार्ग प्रशस्त हो जाएगा
3 महीने पहले
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