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दूर का बुलावा

Aparajit Nandi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जहाँ खड़े हो तुम आज,
        
                                                    
                            
वहाँ दिल का कोई साज़ नहीं बजता,
लगता है हर कदम पर यूँ,
जैसे कोई सपना अधूरा सा सजता।
नज़रें तकती हैं उस पार का मंज़र,
जहाँ सोच का एक नया शहर बसाया है,
"मुझे तो होना चाहिए था कहीं और"

बस इसी एक ख़्याल ने मन भरमाया है।
सोचो, अगर जादू की कोई राह निकल आए,
एक चुटकी बजते ही तुम वहाँ पहुँच जाओ,
जहाँ पहुँचने के सपने तुम हर रात बुनते हो,
जहाँ की धुन तुम हर पल सुनते हो।
पर ठहरकर ज़रा सोचो उस पल में,
क्या पहुँचते ही तुम्हें सब मिल जाएगा?

या फिर वहाँ भी पहुँचकर यह चंचल मन,
किसी और ही अनजानी राह पर भटक जाएगा?

क्योंकि तलाश जगह की नहीं,
ठहराव की उस प्यास की है,
जो यहाँ रहकर भी दूर है,
और दूर जाकर भी पास की है।

 
2 महीने पहले
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